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बलिदान दिवस 20 मार्च - वीरांगना रानी अवंती बाई

 Sudarshan News Beuro |  2017-03-20 02:17:17.0

बलिदान दिवस 20 मार्च  - वीरांगना रानी अवंती बाई

कुछ चाटुकार इतिहासकारों द्वारा उचित सम्मान से विरक्त रखी गयीं व् क्रूर अंग्रेजों से लड़ कर उन्हें ज्वाला रूपी भारतीय नारी शक्ति के साक्षात दर्शन करवाने वाली व् आज ही के दिन अर्थात 20 मार्च को बलिदान हो कर सदा के लिए अमर हो गयी भारतीय नारी शकित की प्रतीक मध्य प्रदेश मण्डला के रामगढ़ राज्य की रानी अवन्तीबाई को आज उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन न्यूज की तरफ से भावभीनी व् अश्रुपूरित श्रद्धांजलि...

विस्तारवादी सोच के कारण पूरी दुनिया को गुलाम बनाने निकले अंग्रेजों के तत्कालीन अधिकारी डलहौजी का पत्र जैसे ही दूत ले कर रानी अवंतीबाई के दरबार में आया जिसमे लिखा था कि राजा के विक्षिप्त होने के कारण हम शासन की व्यवस्था के लिए एक अंग्रेज अधिकारी नियुक्त करना चाहते हैं ठीक तभी वीरांगना रानी समझ गयी कि अब अंग्रेजों को नारी शक्ति के दर्शन कराने का समय आ गया है . इसीलिए उन्होंने उत्तर भिजवाया कि महराज स्वस्थ हैं और मैं उनकी आज्ञा से राजकार्य देख रही हूँ, जब तक मेरे बेटे अमानसिंह और शेरसिंह बड़े नहीं हो जाते। अतः रामगढ़ को किसी भी प्रकार से किसी भी अंग्रेज अधिकारी की कोई आवश्यकता नहीं है।

पर सत्ता लोलुप्त ब्रिटिशों की नजर उनके राज्य पर गड़ चुकी थी , इसलिए इनकार के बावजूद भी डलहौजी ने जबरन वहां अंग्रेज अधिकारी नियुक्त कर दिया। दैवयोग से इस बीच महराज का स्वर्गवास हो गया जिसके बाद राज्य की पूरी जिम्मेदारी रानी अवंतीबाई के कंधो पर आ गयी . महारानी जी जानती थी कि भविष्य में इन सत्ता के भूखे ब्रिटिशों से युद्ध होना ही है इसलिए उन्होंने आसपास के उन देशभक्त रजवाड़ों से सम्पर्क किया जो अपनी पड़गी अंग्रजों के चरणों में नहीं चढा चुके थे ... उनमे से तमान महारानी के साथ अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार हो गए ..

वह क्रान्ति काल 1857 था जब नाना साहब पेशवा को सेनापति मान कर भारत के तमाम वीर व् वीरांगनाएं अंग्रेजों को बाहर निकालने की तैयारी कर रहे थे । महरानी अवंतीबाई के रामगढ़ में भी क्रान्ति का प्रतीक लाल कमल और रोटी घर-घर घूम रही थी। रानी अवंतीबाई जी ने स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में अपनी आहुति देने का निश्चय किया व् उनके रौद्र रूप को देखकर ब्रिटिश अफसर वाशिंगटन ने रामगढ़ पर हमला बोल दिया। रानी इस हमले के लिए तैयार थी और उन्होंने रंगौशाल दिखाते हुए खैरी गाँव के पास अंग्रेज अफसर वाशिंगटन को घेर लिया। रानी के प्रचण्ड युद्ध कौशल से अंग्रेजों के पाँव उखड़ने लगे। इसी बीच रानी ने तलवार के भरपूर वार से ब्रिटिश अफसर वाशिंगटन के घोड़े की गरदन उड़ा दी। वाशिंगटन नीचे गिर पड़ा और रो रो कर रानी से अपने प्राणों की भीख माँगने लगा, भारतीय संस्कारों में पूरी तरह बंधी रानी ने उसे छोड़ दिया।

अपने प्राणदान को भूल कर वही एहसान फरामोश वाशिंगटन दोगुनी सेना ले कर 1858 में फिर से रानी के किले को घेर लिया; जहां उसे तीन माह तक किले में घुसने में सफलता नहीं मिली .. पर दूसरी तरफ किले में खाने पीने का सामन आदि समाप्त हो गया था अतःखान पान व्र रसद की व्यवस्था करने रानी अपने कुछ विश्वासपात्र सैनिकों के साथ एक गुप्तद्वार से बाहर निकल पड़ी। इसी बीच किले के द्वार खोलकर रानी के जांबाज़ सैनिक अंग्रेजों पर टूट पड़े; पर कुछ गद्दारों ने ब्रिटिश अफसर वाशिंगटन को रानी के किले से बाहर होने की सूचना दे दी ... रानी को पकड़ने के उद्देश्य से वाशिंगटन एक सैन्य टुकड़ी लेकर रानी के पीछे दौड़ा और देवहारगढ़ के जंगल में एक बार फिर दोनों की मुठभेड़ हुई।

वह 20 मार्च, 1858 का दिन था जब रानी अवंतीबाई ने साक्षात काल का रूप धारण कर लिया; वह रणचण्डी बनकर अंग्रेजों पर टूट पड़ी। अचानक एक ब्रिटिश सैनिक के वार से रानी का दाहिना हाथ कट गया और उनकी तलवार छूट गयी... अपनी पावन देह को किसी हालात में जीते जी विधर्मी अंग्रेजों को न छूने देने की शपथ उठा चुकी रानी ने एक झटके से अपने बायें हाथ से कमर से कटार निकाली और अपने सीने में घोंप ली। अगले ही क्षण रानी का मृत शरीर घोड़े पर झूल गया।

ऐसी वीरांगनाओं के स्थान पर जब भारत का संचार माध्यम माई चॉइस जैसे संस्कृति विरोधी लोगों का प्रचार करता है तब सवाल उठता है कि अगर ये रानी अवंतीबाई जी के समय में होते तो किसके साथ खड़े होते ? अंग्रेजों के साथ या रानी के साथ ?

आइये मिल कर सम्मान दिलाते हैं रानी अवंतीबाई जैसी हजारों वीरांगनाओं को जिन्होंने अपने रक्त से भारत कि भूमि को सींच है और जिन्हें चाटुकारिता के बदले जमीर बेच चुके कुछ तथाकथित लोगों ने इतिहास के सुनहरे पन्नो में उचित स्थान नहीं दिया .. चलिए मिल कर लड़ते हैं हम और आप सांस्कृतिक आज़ादी की इस लड़ाई को जहां रानी अवंतीबाई जैसी नारियों के तैमूर पैदा करने वाली तथाकथित स्टारों से अधिक भक्त व् अनुयायी हों ...बनिए सुदर्शन न्यूज कि राष्ट्रनिर्माण मुहिम के अंग और बनाईये एक बार फिर से भारतवर्ष को विश्व गुरु जिसके शिक्षक, शिक्षिकाएं रानी अवंतीबाई जैसी वीरांगनाये हों ..

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