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जलियावाला बाग़ जैसा ही एक नरसंहार जिसे भुला दिया कुछ चाटुकार इतिहासकारों ने

 Sudarshan News Beuro |  2017-03-07 14:08:06.0

जलियावाला बाग़ जैसा ही एक नरसंहार जिसे भुला दिया कुछ चाटुकार इतिहासकारों ने

गुजरात : गुजरात के उन 1200 बलिदानियों को आज उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन न्यूज की तरफ से भावभीनी व् अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। 7 मार्च 1922 की वो घटना जब ब्रिटिश हुकूमत को एक जगह जमा 1200 स्वतन्त्रता सेनानी अपने लिए लगने लगे थे बड़े खतरे के समान। गुजरात, साबरकांठा के अंतरीयाल यानी की पाल-दढवाव में अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए हो रही आदिवासी वीरों की इस सभा को सहना पाये ब्रिटिश अफ़सर और कायरों की तरह घेर कर मार दिया 1200 निहत्थे वीरों को।

उस दिन विजयनगर तहसील के पाल दढवाव गांव में हजारों स्वतंत्रता सेनानी जमा थे जिसका विषय था अंग्रेजों द्वारा जनता पर हो रहे शोषण व् अत्याचार का प्रतिकार। ब्रिटिश अफ़सर सुरजी निनामा को ये सभा अपने साम्राज्य के लिए खतरा लगने लगी और उसने वहां मौजूद प्रत्येक व्यक्ति के कत्ल का आदेश दिया। इसके बाद गोलियों की बौझार हो गयी जिसमें 1200 से अधिक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। ख़ास बात यह है कि गोलियाँ बरसाने वाले सिपाहियों में सारे के सारे अंग्रेज नहीं थे।


गोलियों की बौझार में हुई अफरातफरी में कई लोग जान बचाने के लिए वहाँ मौजूद पूर्व सरपंच कमजीभाई डामोर के घर के पास एक कुंए में छलांग लगा दी थी। जिस से पूरा कुंआ लाशों से पट गया था। अब यह कुआँ उनकी याद का स्मारक बना गया है। इस आयोजन की जड़ में एक महान आदिवासी नेता "मोतीलाल जी" व् ' रामजी भाई मंगलाजी परमार' जी थे जिन्होंने इस घटना के दिन आदिवासियों को बड़ी संख्या में इकट्ठा होने व् ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बिगुल फूंकने के लिए प्रेरित किया था जिसके लिए वो महीनों तक घर बार छोड़ कर वे इलाके में घूमे थे।

गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री व् वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के हस्तकमलों द्वारा यहां पर 1200 लोगों की याद में 1200 पौधे रोपकर स्मारक बनाया गया है, वो सारे रोपे गये पौधे अब वृक्ष बन चुके हैं। प्रतिवर्ष 7 मार्च को यहां पर शहीदों को श्रृदांजली देने के लिए लोगों की भीड़ जमा होती है। फिर भी इतिहास के चमकदार पन्नों से वो 1200 वीरों के नाम गायब हैं। आखिर क्यों? सुदर्शन न्यूज द्वारा छेड़ी गयी सांस्कृतिक आज़ादी की मुहिम के अंग और बदलें एकतरफा इतिहास को जो बार-बार बिना खड्ग बिना ढाल को भारत की आज़ादी का आधार बताती है।


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