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बलिदान दिवस महायोद्धा दरियाव सिंह, एक गुमनाम योद्धा जो अपने पूरे परिवार संग चढ़ा फाँसी...

 Sudarshan News Beuro |  2017-03-06 06:52:02.0

बलिदान दिवस महायोद्धा दरियाव सिंह, एक गुमनाम योद्धा जो अपने पूरे परिवार संग चढ़ा फाँसी...

1857 की क्रान्ति के उस महानायक जिसे कुछ चाटुकार इतिहासकारों ने भुला दिया, वो योद्धा जिसने अपने पराक्रम के दम पर एक बार अंग्रेजों को धकेल दिया व् दूसरी बार पूरे परिवार के संग आज ही के दिन अर्थात 6 मार्च को फाँसी चढ़ गया। ऐसे रक्तरंजित गौरवमय इतिहास के अभिन्न अंग महायोद्धा दरियाव सिंह जी को आज उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन न्यूज की तरफ़ से भावभीनी व् अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

वीर दरियाव सिंह का जन्म सन 1795 में पवित्र यमुना नदी के मध्य भूभाग में बसे खागा नगर में तालुकेदार ठा० मर्दन सिंह के पुत्र रत्न के रूप में हुआ। प्राचीन काल में इनके वंशज खड्ग सिंह चौहान जी ने इस भूभाग को अपने अधिकार में लेकर एक नये नगर का निर्माण कराया था, जो बाद में उन्ही के नाम पर खागा नाम से प्रसिद्ध हुई, वर्तमान में यह उत्तरप्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित है।


श्री दरियाव सिंह जी का ननिहाल ग्राम बुदवन, खागा,जनपद फतेहपुर में श्री पाल सिंह के यहाँ था और इनकी ससुराल ग्राम सिमरी, जनपद रायबरेली में थी। इनकी धर्मपत्नी का नाम सुगंधा था, इनके दो पुत्र और दो कन्याएं थी। जिनमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम सुजान सिंह और छोटे पुत्र का नाम देवी सिंह था। सन 1808 तक इस भूभाग पर इनका अपना स्वतन्त्र राज्य था, इसके बाद में यह भूभाग अंग्रेजो के आधीन हुआ।

दरियांव सिंह धर्म परायण, साहसी स्वाभिमानी रणविद्या में निपुण व् संगठन कौशल के महारथी थे। सन् 1857 में इस वीर के नेतृत्व में जनता ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर 8 जून 1857 को अंग्रेजो को परास्त कर जनपद के इस भूभाग को अपने अधिकार में लेकर स्वतंत्रता का परचम लहराया, पर कुछ ही मास बाद यह राज्य कुछ विश्वासघातियों के कारण फिर अंग्रेजो के आधीन हुआ और अंग्रेजो से जीता पर अपनों की गद्दारी से हारा यह वीर अपने परिवार एवं मित्रो सहित गिरफ्तार हुआ।

वहीं, ब्रिटिश न्यायालय में बिना डरे, बिना झुके अपना पक्ष रखने के कारण आज ही के दिन अर्थात 6 मार्च 1858 को पूरे परिवार व् मित्रगणों के संग सामूहिक फांसी पर चढ़ कर यह महावीर भारत माँ की स्वाधीनता हेतु सदा के लिए अमर हो गया। उनकी पूरी सम्पत्ति बाद में अंग्रेजो ने उन चाटुकार गद्दारों में बाँट दी जिनकी गद्दारी से ये योद्धा रुपी सूरज अस्त हुआ। आज भी इनके भव्य गढ़ी के ध्वंसा अवशेष इनके त्याग पराक्रम वीरता सघर्ष और बलिदान की गाथा गाते हैं। यदि आप ऐसे वीरों का स्वर्णिम इतिहास अपनी आने वाली पीढ़ियों को सुनाना चाहते हैं तो शामिल हों सुदर्शन न्यूज द्वारा छेड़ी गयी सांस्कृतिक आज़ादी के आंदोलन में।

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