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तैमूर का नामकरण या क्रूरता की यादों का पुर्नजन्म

 Sudarshan News Beuro |  2017-03-05 08:42:34.0

तैमूर का नामकरण या क्रूरता की यादों का पुर्नजन्म

अनिल पाल/नई दिल्ली : तैमूर नाम सुनकर, उसके बारे में पढ़कर हर किसी की रूह कांप जाती है। वह ऐसा क्रूर, निर्दयी, दुर्दांत आक्रमणकारी जिसने निर्दोष लोगों का कत्ल किया और भयंकर लूटपाट की। लाखों करोंडो हिंदुओं को मौत के घाट उतारा। आज के कुछ लोग जो खुद को बुद्धिजीवी और आधुनिक बताते हैं उस व्यक्ति के नाम पर अपने बेटे का नामकरण करते हैं जो धर्म के मामले में कट्टर और निर्दयी हो। ऐसा करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं, यह एक सामान्य प्रक्रिया मात्र है। वे खुद को कहेंगे प्रगतिवादी और अपने औलाद की नाम रखेगें क्रुर, अत्याचरी, बलात्कारी, आक्रमणकारी के नाम पर जिसने इस देश को लूटा हो। कहेंगे कि हमारी मर्जी मां-बाप को अपने औलाद का नाम अपनी पंसद की रखने की आजादी है। इस एक सत्य के साथ तमाम तरह के कुतर्क भी देंगे।


कई लोग तो कहते है कि इस्लाम शांति पसंद मजहब है। इतिहास गवाह है कि इस्लाम कितना शांति पंसद मजहब है....

अगर हम बात करें तैमूर लंग से ही तो उसने मध्य एशिया पर आक्रमण किया, लूटा, लाखों-करोड़ो निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारा। वह भी धर्म का कट्टर मुसलमान था। तैमूर से लेकर औरंगजेब तक के शासन काल को कौन नहीं जानता।

चलिए हम इतिहास को छोड़ देते हैं साहब। जो बीत गया वो कल था। आज के इस दौर में अगर किसी से जंग हो रही है तो वह है आतंकवाद। तो सबसे पहले तालिबान से आतंकवाद के खिलाफ जंग शुरू होती है और औसामा बिन लादेन से चलकर सद्दाम हुसैन, गद्दाफी से होते हुए आज बगदादी तक आती है। अगर आपके पास आंख हो तो खोल कर देख लीजिए कहीं ये शांति पसंद मजहब वाले तो नहीं। बात समझ में आ जाएगी। ये बात तो हो गई अंतराराष्ट्रीय। अब हम बात करते है भारत की।

यही कि भारत में कितने शांति पसंद मजहब वोले लोग है। भारत की आजादी भी मजहब के नाम पर हुई और आजाद होने के बाद भी भारत मजहबी रंग से नहीं छूट पाया। कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि हिंदू सांप्रदायिक होते है क्योंकि मुस्लिम अल्पसंख्यक है। जब बात आती है अल्पसंख्यक की तो सबसे पहले बात करते है जम्मू कश्मीर की। जहां इनकी संख्या ज्यादा हुई वहां हिंदु अल्पसंख्यक हो गया। जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं के घरों मे आग लगा दी गई। उनके बहन बेटियों की आबरू लूटी गई। उन्हे इतना प्रताड़ित किया गया कि वो दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। और जम्मू में आज हिंदू अल्पसंख्यक हो गया, लेकिन फिर भी कुछ लोगों को इस्लाम शांति पसंद मजहब लगता है।

आज अगर एक नजर डाले उन सीमांत प्रदेशों की जहां मुस्लिम बहुसंख्यक है तो क्या वहां शातिं है? आज पश्चिम बंगाल में जो कुछ हो रहा है क्या कोई देख नहीं रहा कि वहां शांति पसंद मजहब वाले क्या कर रहे है। जहां-जहां मुस्लिम बहुसंख्यक है वहां वहां आज संवेदनशील इलाका घोषित हो चुका है। चाहे वो पश्चिमी यूपी हो या बिहार का पुर्णिया, पश्चिम बंगाल का मालदा, हावड़ा वो तमाम जिलें आज संवेदनशील इलाका घोषित हो चुके है। तो जहां-जहां शांति पसंद मजहब वाले ज्यादा है वहीं क्यों संवेदनशील इलाका घोषित किया गया है? जरा सोचों।

हिंदुओं को ही क्यों बार-बार निशाना बनाया जाता है। एक आकड़े के मुताबिक भारत के सबसे विवादित स्थान जहां-जहां है उसमें एक पक्ष कोई और धर्म है तो दुसरा धर्म जरूर मुस्लिम है क्यों?

भोजशाला, धार।

मांडू का जहाज महल।

काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी।

ताजमहल, आगरा।

कुतुब मीनार, दिल्ली।

लाल किला, दिल्ली।

आगरा का किला।

अढाई दिन का झोपड़ा, अजमेर

कृष्ण जन्मभूमि, मथुरा

राम जन्मभूमि, अयोध्या।

जहां हिंदु एक तरफ प्रगतिवादी विचार धारा अपना कर अपनी जनसंख्या कम कर रहे हैं, वहीं मुसलमानों की आबादी दुगनी गति से बढ़ रही है। 2011 की जनगणना इसका जीता जागता सबूत है। आंकड़ों के अनुसार 2011 में देश की कुल आबादी एक अरब 21 करोड़ थी। इसमें से हिन्दुओं की आबादी 79.8 फीसदी यानी 96.63 करोड़ है। वहीं, मुस्लिमों की आबादी 14.2%। रिपोर्ट के अनुसार हिन्दुओं की आबादी 0.7% घटी है जबकि मुस्लिम आबादी 0.8% बढ़ी है।

वे राज्य हैं जहां मुस्लिम जनसंख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई। वैसे, खास बात यह है कि देश में मणिपुर एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मुस्लिम आबादी कम हुई है। यहां मुसलमानों की आबादी दर में 0.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

इन राज्यों में सबसे ज्यादा बढ़ी मुस्लिम आबादी

राज्य 2001 2011 ग्रोथ

असम 30.9 % 34.2 % 3.3 %

प. बंगाल 25.2 % 27 % 1.8 %

केरल 24.7 % 26.6 % 1.9 %

गोवा 6.8 % 8.4 % 1.6 %

जम्मू-कश्मीर 67 % 68.3 % 1.3 %

लक्षद्वीप 95.5 96.2 0.7

उत्तर प्रदेश 18.5 19.3 0.8

बिहार 16.5 16.9 0.3

झारखंड 13.8 14.5 0.7

कर्नाटक 12.2 12.9 0.7

उत्तरांचल 11.9 13.9 2.0

दिल्ली 11.7 12.9 1.1

महाराष्ट्र 10.6 11.5 0.9

आंध्र प्रदेश 9.2 9.6 0.4

गुजरात 9.1 9.7 0.6

मणिपुर 8.8 8.4 - 0.4

राजस्थान 8.5 9.1 0.6

अंडमान-निकोबार द्वीप 8.2 8.4 0.2

त्रिपुरा 8.0 8.6 0.6

दमन एवं दीव 7.8 7.8 0.0

मध्य प्रदेश 6.4 6.6 0.2

पांडिचेरी 6.1 6.1 0.0

हरियाणा 5.8 7.0 1.2

तमिलनाडू 5.6 5.9 0.3

मेघालय 4.3 4.4 0.1

चंडीगढ़ 3.9 4.8 0.9

दादरा एवं नागर हवेली 3.00 3.8 0.8

ओडिशा 2.1 2.2 0.1

हिमाचल प्रदेश 2.00 2.2 0.2

छत्तीसगढ़ 2.0 2.0 0.0

अरुणाचल प्रदेश 1.9 2.0 0.1

नागालैंड 1.8 2.5 0.7

पंजाब 1.6 1.9 0.3

सिक्किम 1.4 1.6 0.2

मिजोरम 1.1 1.4 0.3



यूपीए सरकार ने नहीं जारी किए थे आंकड़े...

-साल 2001 में बिहार में मुस्लिमों की संख्या 1 करोड़ 37 लाख 22 हजार 048 थी, जो 2011 में 1 करोड़ 75 लाख 57 हजार 809 हो गई।

-उत्तर प्रदेश में यह संख्या 2001 में 3 करोड़ 07 लाख 40 हजार 158 थी जबकि 2011 में यह 3 करोड़ 84 लाख 83 हजार 967 हो गई।

-असम में मुस्लिमों की आबादी सबसे तेजी से बढ़ी. 2001 में राज्य की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 30.9 फीसदी था लेकिन एक दशक बाद यह आंकड़ा बढ़कर 34.2 फीसदी हो गया।

-पश्चिम बंगाल में भी मुस्लिमों की जनसंख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 2001 में राज्य की कुल आबादी के 25.2 फीसदी की तुलना में 2011 में यह 27 प्रतिशत तक पहुंचा गया।

-उत्तराखंड में भी मुसलमानों की आबादी में तेजी देखने को मिली है. उत्तराखंड की कुल जनसंख्या में मुसलमानों की हिस्सेदारी 11.9 फीसदी से बढ़कर 13.9 फीसदी हो गई है।

एक प्रश्न उठता है कि हम इस्लाम को मानने वाले लोगों पर विश्वास ही क्यो करें? उन्होने कब हमारे विश्वास को जीता है। अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो हम देखेंगे कि वो हमेशा हमारे साथ विश्वास घात ही किए हैं। तो हम उनपर विश्वास ही क्यों करें। विश्वासघात का सबसे बड़ा उदाहरण भारत का टुकड़ा होना और पाकिस्तान का बनना ही है। अगर इतना बड़ा उदाहरण मिलने के बावजूद जिन लोगों को उन पर विश्वास रहा आज वही लोग पाकिस्तान और बांग्लादेश में भोग रहे हैं। यही हाल जम्मू में रहने वालों का था। अब उन्हे पता चल रहा है। वही हाल बंगाल के रहने वालों का था कि वो भाईचारा पसंद लोगो के साथ रहते हैं। लेकिन आज उनके साथ क्या हो रहा है। आज उन्हे अच्छी तरह से पता चल रहा है। इसलिए सावधान हो जाओ। सचेत रहो। विश्वास करो लेकिन किसी पर अंधा-विश्वास मत करो।

हम क्यों करे किसी पर विश्वास? इस्लाम कितना शांति पसंद मजहब है यह बताने के लिए मैं बदां बहादुर के बारे बताना चाहुंगा कि मुसलमानों ने उनके साथ कितनी बर्बरता की। फ़रवरी, 1716 में बन्दा और उसके 794 साथियों को कैद करके दिल्ली ले जाया गया। उन्हें अमनावीय यातनाएँ दी गईं। प्रतिदिन 100 की संख्या में सिक्ख फाँसी पर लटकाए गए। उनको भयभीत करने के लिए उनके पाँच वर्षीय पुत्र अजय सिंह को उनकी गोद में रखकर बन्दा के हाथ में छुरा देकर उसको मारने को कहा गया। जब बन्दा जी ने इससे इन्कार कर दिया तो इस पर जल्लादों ने उस बच्चे के दो टुकड़ेकर के उसके दिल का माँस बन्दा के मुँह में ठूँस दिया। फिर भी उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा तो इन सब ने लाल गरम लोहे के चिमटों से मांस नोचना शुरू कर दिया। मांस नोचे जाने के कारण उनके शरीर में केवल हड्डियाँ शेष थीं। फिर भी आठ जून, 1716 को उस वीर को हाथी से कुचलवा कर मार डाला।

तो क्या ऐसे इस्लाम को मानने वालों पर विश्वास करना चाहिए। जिस व्यक्ति ने इतनी प्रताड़ना सहकर भी अपना धर्म नहीं छोड़ा और अपने मर्म को उन हिंदुओं को सावधान करने के लिए कह गए कि 'हिंदुओं अगर कोई मुसलमान अपना हाथ तेल के टीन में डालकर, तिल के बोरी में डाले और हाथ में जितना तिल लगे अगर उतनी बार भी कोई मुसलमान तुम्हें भरोसा देने की कोशिश करें तब भी भरोसा मत करना।'

ये सारी बात उन्होने ऐसे ही नहीं कही होंगी। उन सिक्ख गुरूओं से पूछो। उनके बारें मे पढ़ो कि उन्होने मुसलमानों की कितनी यातनाएं सहीं है। तब तो पता चलेगा कि कौन शांति पसंद मजहब है।

ये सोचते हैं तैमूर नाम रखकर अपनी जात की असलियत दिखाने वाले कि हमारे पूर्वजों पर तैमूर नाम का धब्बा हट जाएगा जब ये बड़ा होकर अच्छा काम करेगा। कभी ऐसा नहीं हो सकता। नाम का असर जरूर होगा।

कई लोग यह तर्क दे रहे है कि हिंदु लोग भी क्यों न अपने औलाद के नाम भी रावण, कैकेयी या कुछ और रख लें क्या फर्क पड़ता है। हम तो कहेंगे कि तुम मानवता के दुश्मन, क्रुर, अत्याचारी, बलात्कारी, आक्रमणकारी निर्दयी के ही नाम रख सकते हो क्योंकि तुम्हारे जात धर्म में कोई उच्च विचारों वाला आदर्श नहीं है कि तुम जिसका अनुसरण कर सको।

इतिहास गवाह है कि हम तो भगवान राम की मदद करने वाले विभीषण के नाम भी रखना पसंद नहीं करते क्योंकि उन्होने अपने धर्म, अपने देश और अपने भाई के साथ धोखा किया था। इससे भी उंचे विचारों वाले आदर्श हमारे संस्कृति समाज और सभ्यता में है।

तुम हमें सीखाना बंद करो।


ये लेखक का निजी विचार हैं...

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