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अंधापन आंखों का या मानवता का...

  |  2017-03-16 07:11:44.0

अंधापन आंखों का या मानवता का...

राजधानी दिल्ली के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में मेट्रो का अहम् योगदान है, यहां तक की अगर मेट्रो की व्यवस्था को दिल्ली की जीवनरेखा के नाम से रूपांतरित करे तो इसमें कोई शक नहीं है। मेट्रो में सीनियर नागरिकों और विकलांगों के लिए अलग से पर्याप्त सीटे हैं। लेकिन आज के पढ़े-लिखे, अप टू डेट, मार्डन नौजवान अपने कान में हैडफोन लगा कर उस सीट पर बैठ जाते हैं। खाली सीट पर बैठना गलत बात नहीं है, लेकिन जब सही मायने में उसका हकदार आए तो मानव सभ्यता दिखाना हर एक नागरिक का परम धर्म हैं कर्तव्य हैं। लेकिन कर्तव्य निभाना तो छोड़ो वे उस वक्त दिशाहीन हो जाते हैं जैसे उन्होंने कुछ देखा ही नहीं कोई विकलांग या वरिष्ठ नागरिक उसके सामने खड़ा है।


ये विडम्बना यही तक खतम नहीं होती लोग इतने स्वार्थी हो गए है कि गर्भवती महिला को देखकर भी खुद सीट नहीं देते या तो गर्भवती को सीट मांगनी पड़ती है या कोई और जिसे ज्ञात है कि इंसानियत क्या है वो उसके लिये सीट का इंतजाम करता है।


मैं बात कर रहीं हूं कुछ दिनों पहले की जब मैं नोएडा सेक्टर 15 से राजीव चौक के लिए मेट्रो से सफर कर रही थी। राजीव चौक आने के 2 स्टेशन पहले एक गर्भवती महिला ने मेट्रो में प्रस्थान किया। नजारा यह था की खड़े हुए लोग बुत बनकर खड़े रहे और सीट पर बैठे लोगों की तो जैसे हवाइयां उड़ गई की अब हमें खड़ा होना पड़ेगा। जहां तक मेरी नजर जा रही थी उन लोगों को देख कर लग रहा था कि मानो सोच रहे हो की में क्यों खड़ा होऊं बगल वाला हो जायेगा।


मैंने बड़ी विनम्रता से आगे बढ़कर एक सज्जन दिखने वाले व्यक्ति से कहा कि कृपा कर के इन्हें सीट दे दें बस फिर क्या था उसने मुझे इस तरह देखा मानो मैंने उससे उसकी जायदाद मांग ली हो।

तो यह है मेट्रो के सफर की कहानी...


मेरी मेट्रो प्रशासन के अधिकारियों से प्रार्थना हैं कि कोई इस प्रकार की व्यवस्था करे की आरक्षित सीटों का उपयोग केवल वही करें जिनके लिए आरक्षित की गई है और साथ ही गर्भवती महिलाओं के मेट्रो में स्पेशल सीट का प्रावधान हो।


इस आलेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हैं।

(रशिम अग्रवाल)


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